NH-30 पर स्थित जनपद प्राथमिक पाठशाला में शिक्षकों की कमी और भवन का अभाव, कभी जिले की शैक्षणिक पहचान रही स्कूल की विरासत बचाने की उठी मांग
कोंडागांव। छत्तीसगढ़ के कोंडागांव में नेशनल हाईवे-30 पर स्थित जनपद प्राथमिक पाठशाला आज अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, लगभग 1911 में स्थापित इस ऐतिहासिक स्कूल ने एक सदी से अधिक समय तक क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाई। कभी यहां करीब 400 विद्यार्थी पढ़ाई करते थे, लेकिन वर्तमान में विद्यार्थियों की संख्या घटकर महज 81 रह गई है।
बताया जाता है कि अंग्रेजों के जमाने में स्थापित यह पाठशाला आजादी से करीब 36 साल पहले से शिक्षा का केंद्र रही है। एक समय कोंडागांव और आसपास के गांवों के बच्चों के लिए यह प्रमुख प्राथमिक विद्यालय था। स्थानीय लोगों का दावा है कि यहां से शिक्षा प्राप्त कर कई विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, तहसीलदार और अन्य पदों पर पहुंचे। कभी अनुशासन और शिक्षा के लिए पहचान रखने वाली इस पाठशाला की मौजूदा स्थिति लोगों को चिंतित कर रही है।
दो शिक्षकों के भरोसे पांच कक्षाएं
स्कूल की बदहाली के पीछे शिक्षकों की कमी और भवन का अभाव प्रमुख समस्याएं बताई जा रही हैं। जानकारी के अनुसार, यहां महज दो शिक्षक पांच कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में पढ़ाई की व्यवस्था और बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि पर्याप्त शिक्षक और जरूरी सुविधाएं नहीं होने से सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या प्रभावित हो रही है। उनका आग्रह है कि शिक्षा विभाग इस ओर ध्यान देकर शिक्षकों की नियुक्ति करे और स्कूल की व्यवस्था सुधारे।
विरासत को कौन संभालेगा?
इस ऐतिहासिक परिसर में भवन की कमी के कारण लगभग तीन वर्षों तक केंद्रीय विद्यालय का संचालन भी किया गया। वर्तमान में यहां नर्सिंग होम सेंटर संचालित होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कोंडागांव के शिक्षा इतिहास से जुड़ी इस धरोहर के संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
स्थानीय लोगों ने स्कूल में पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, भवन के जीर्णोद्धार और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कोंडागांव की यह ऐतिहासिक पाठशाला अपनी पुरानी पहचान खो सकती है। अब देखना होगा कि शासन और प्रशासन इस विरासत को बचाने के लिए क्या पहल करते हैं।
