“पब्लिक टॉकीज संवाददाता”
कोंडागांव।एक शिक्षक समाज, छात्र और देश के भविष्य की नींव रखता है। ऐसे में शिक्षकों का न केवल मानसिक रूप से बल्कि शारीरिक रूप से सक्षम होना भी आवश्यक माना जाता है, ताकि वे विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा दे सकें। लेकिन जब कोई शिक्षक गंभीर बीमारी के चलते शारीरिक रूप से अक्षम हो जाए, तब शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के भविष्य को लेकर कई अहम सवाल खड़े हो जाते हैं। ऐसा ही एक मामला कोंडागांव जिले के फरसगांव विकासखंड अंतर्गत ग्राम जुगानीकलार से सामने आया है।
ग्राम जुगानीकलार निवासी सूकलूराम नेताम पिछले कई वर्षों से गांव की प्राथमिक शाला में शिक्षक के रूप में पदस्थ हैं। वर्ष 2013 में उन्हें अचानक पैरालिसिस अटैक आया, जिसके बाद वे बोलने और अन्य शारीरिक गतिविधियों में काफी हद तक असमर्थ हो गए। लंबे इलाज के बावजूद उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हो सका। इसके बावजूद उनका स्कूल और नौकरी से लगाव इतना गहरा है कि वे आज भी नियमित रूप से विद्यालय पहुंच रहे हैं।
शारीरिक रूप से असमर्थ होने के कारण सूकलूराम नेताम अपने खर्च पर एक ट्यूटर को साथ लेकर स्कूल आते हैं और उसी के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने का कार्य कराते हैं। बीते 8 से 10 वर्षों से यही व्यवस्था चल रही है। हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी निजी ट्यूटर के माध्यम से शासकीय विद्यालय में अध्यापन कराना नियमसम्मत है और क्या उस ट्यूटर की शैक्षणिक दक्षता बच्चों के भविष्य के लिए पर्याप्त है।
ग्रामवासियों का कहना है कि पहली से पांचवीं कक्षा तक की शिक्षा ही बच्चों के जीवन की बुनियाद होती है। ऐसे में अध्यापन कार्य प्रभावित होना बच्चों के भविष्य के साथ समझौता है। इसी को लेकर गांव के सरपंच सहित ग्रामीणों ने कई बार जिला शिक्षा अधिकारी और कलेक्टर को ज्ञापन व जनदर्शन के माध्यम से अवगत कराया है। ग्रामीणों की मांग है कि सूकलूराम नेताम को किसी ऐसे पद या स्थान पर पदस्थ किया जाए, जहां बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, या फिर उनके स्थान पर किसी अन्य शिक्षक की नियुक्ति की जाए।
ग्रामीणों ने यह भी सुझाव दिया है कि यदि संभव हो तो सूकलूराम नेताम स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वॉलंटरी रिटायरमेंट) ले लें, लेकिन वे अपने पद पर बने रहने के इच्छुक हैं। वर्तमान में इस प्राथमिक शाला में कक्षा पहली से पांचवीं तक कुल 13 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं और दो शिक्षक पदस्थ हैं, जिनमें एक स्वयं हेडमास्टर सूकलूराम नेताम हैं। अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस संवेदनशील मामले में बच्चों के हित और शिक्षक की सेवा—दोनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है।
